मरीजों की जान को लगातार बढ़ रहा खतरा, डाक्टरी की डिग्रियां ले मुन्नाभाई एमबीबीएस/एमएस डाक्टरों ने पंजाब में मक्कड़ जाल बिछाया,

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बरनाला,24अक्टूबर (अखिलेश बंसल)
पैसे के दम पर बाहरी प्रान्तों से डाक्टरी की डिग्रियां ले मुन्नाभाई एमबीबीएस/एमएस डाक्टरों ने पंजाब में मक्कड़ जाल बिछा रखा है। जो लोगों की जिन्दगी से खिलवाड़ करते आ रहे हैं। कोई मामला विवादित हो जाने पर पहले पैसे के दम पर बचने की कोशिश करते हैं, कोई दाल नहीं गलने पर आईएमए की आड़ लेकर बच निकलते हैं। ऐसे एक राजाभाई एमबीबीएस का दूसरा मामला ध्यान में आया है। घटना एक साल पहले की है। जिसमें उक्त डाक्टर के हाथों हर्निया का आप्रेशन कराने पहुंचे एक व्यक्ति को अपनी जान से हाथ गंवाना पड़ा था। विदेश में अपना कारोबार चला रहे मृतक के सपुत्र ने अपने पिता की मौत के कारणों का पता लगाने के लिए भारत के एनआरआई विंग अधिकारियों को केन्द्रिय जांच ब्यूरो दिल्ली एवं डीजीपी, आईजी (क्राईम), विजीलेंस पंजाब को पत्र लिखा है।

पिता की मौत का पता लगाने भारत को लिखा पत्र:
विदेश में रहते भारत के बरनाला शहर के मूलनिवासी देव सिंह का कहना है कि कचेहरी चौक फ्लाईओवर ब्रिज के पास नर्सिंग होम की आड़ में अस्पताल चला रहे बरनाला के एक डाक्टर की लापरवाही व अनपढ़ता से उसके पिता स. जतिन्दर
सिंह की मौत हो गई थी। जिसकी जांच पड़ताल करवाने के लिए उसने भारत सरकार के एनआरआई विंग को पत्र लिखा है। उसने बताया कि उक्त डाक्टर ने उसके पिता की हिस्ट्री नोट किए बिना ही हर्निया का आप्रेशन कर डाला। किसी मरीज की हिस्ट्री नोट करने के वक्त हिस्ट्री नोट-बुक पर मरीज के हस्ताक्षर होना या अंगूठे के निशान होना जरूरी होता है। उसका कहना है कि अपने पिता की मौत के कारणों का पता लगाने के लिए डाक्टर द्वारा किए गए ट्रीटमेंट की
पूरी जानकारी लेने के बारे में वह माहिरों से सलाह ले चुके हैं। प्रक्रिया मुकम्मल होते ही वे भारत सरकार के संबंधित शाखा से जांच करवाएंगे। आरोपियों को जेल की सलाखों के पीछे लेजाकर ही दम लेंगे।

धनौला की महिला बन चुकी सदा के लिए रोगी:
पहले मामले में धनौला निवासी नवदीप सिंह उर्फ प्रैटी सदियोड़ा बता चुके है कि शहरों में प्रैक्टिस कर रहे नीम-हकीम एवं गैर-तजुर्बेकार प्रैक्टिशनर व डाक्टर, लोगों की जेबें तो काट ही रहे हैं साथ ही उनकी हंसती-खेलती जिन्दगी से भी खिलवाड़ कर रहे हैं। उसने बताया कि उक्त डाक्टर ने ही उसकी पत्नी का पित्ते का आप्रेशन किया था। आप्रेशन करते
वक्त लीवर की मेन नाड़ी ही काट दी थी। नतीजन उसकी पत्नी सदा के लिए रोगी बन चुकी है। जैसे ही उसने डाक्टर के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश की थी और उसने फेसबुक व वट्स-एप पर मैसेज भी अपलोड किया था, तो डाक्टर ने अपने हल्वाई पिता जो कि कभी लोगों के झूठे बर्तन साफ करता रहा है द्वारा सीधे-असीधे रूप में धमकियां दिलाना शुरू कर दिया था। जिसके बाद उसे चुपहो जाना पड़ा। उसने यह भी बताया कि मैने उन्हें (डाक्टर को) यह कहा था कि
जब तक मेरी पत्नी ठीक ना हो जाए और उसके ईलाज पर चाहे पांच रुपए खर्च हों चाहे पांच हजार उसका सही ईलाज होने तक का ऐग्रीमेंट किया जाए। डाक्टर परिवार मुझे चार/पांच हजार रुपए देकर मामला दबा देना चाहता था, जिसे मैने
ठुकरा दिया था।

समाजसेवियों ने उठाए सवाल:
डाक्टरों द्वारा पीडि़त हुए लोगों की मदद के लिए आगे आए विभिन्न समाजसेवी संगठनों के प्रतिनिधियों हर्ष कुमार वासू, अजीत पाल सिंह, कृषण सिंह आदि ने बताया कि पंजाबी भाषा में कहावत है कि (इक्क गधी थानेदार दा रेता तां की सुट्ट आयी ओह दूजीयां गधीयां च रल नहीं रही सी) के अनुसार दो-दो रुपए का समोसा बेचने वाला एवं लोगों के झूठे बर्तन मांजने वाला जो कोई व्यक्ति खुद को हल्वाईयों का प्रधान कह रहा है उसने अपने खानदानी कारोबार में लडक़े (जिसमे वो काबिल था) को जोडऩे की जगह पर उसे डाक्टर बना दिया। उनका कहना है कि कुछ लोग अपने बच्चों को डाक्टर बनाने के लिए अपनी औकात ना देखते हुए खानदानी और रईसजादे डाक्टरों की नकल पर मुंगेरी लाल जैसे सपन लेने लग पड़ते हैं। जो कि डाक्टर बनने के काबिल नहीं होते। अपनी चौधरगिरी को चमकाने के लिए पैसे के जोर पर बाहरी यूनिवर्सिटियों से डाक्टर तो बना लेते हैं मगर डाक्टर बनने के लिए तजुर्बा जरूरी होता है उसे हासिल करवाने एवं रातो-रात रईसजादे बनने के चक्कर में बच्चों से उसी वक्त प्रैक्टिस करवानी शुरू करवा देते हैं। तजुर्बा नहीं होने के कारण वह डाक्टर लोगों
की जिन्दगी से खिलवाड़ करते आ रहे हैं।

ऐसे बनते हैं डाक्टर:
बता दें कि मौजूदा हालातों में पहले तो बच्चों को डाक्टरी लाइन में दाखिले ही नहीं मिल रहे। उसके लिए भी पैसे के साथ दौड़धूप करनी पड़ती है। जैसे ही कोई छात्र एमबीबीएस की डिग्री हासिल करने के लिए किसी यूनिवर्सिटी में अप्लाई करता है तो उसे यूनिवर्सिटियों को हजारों या लाखों नहीं बल्कि करोड़ों रुपए डोनेशन के तौर पर देने पड़ते हैं। ऐसे में एमबीबीएस /एमएस की डिग्रियां हासिल कर चुके डाक्टरों के परिवार वालों के पास पैसा कहां से आता है उसका भलि-भान्ति अन्दाजा लगाया जा सकता है कि डाक्टर बनाने के लिए बच्चे की पढ़ाई पर खर्च कहां से किया गया होगा।

खुद का इलाज क्यूं ना करवा सका हल्वाई:
सूत्रों का कहना है कि उक्त डाक्टर के हल्वाई पिता ने सपने लेते हुए लडक़े को डाक्टर तो बना लिया लेकिन मामला अटक गया डाक्टर बने लडक़े के लिए अच्छा अस्पताल खोलने का। उक्त हल्वाई ने जलिद पैसा कमाने और लोगों से उधारी में लिया कर्ज लौटाने के लिए अपने ही घर को नर्सिंग होम एवं अस्पताल बना दिया। जनता को कानून पढ़ाने वाले उक्त हल्वाई ने सेहत विभाग के नियमों को भी ताक पर रख दिया और बाकी कसर लडक़े ने पूरी कर दी कि उसने लोगों की जिन्दगियां बर्बाद करना शुरू कर दिया। किसी समय डाक्टर को रब्ब का रूप समझने वाली परिभाषा को तार-तार कर दिया। सूत्रों ने यह भी बताया कि उक्त डाक्टर के हल्वाई पिता अनेकों बीमारियों से ग्रस्त हैं। जिसका इलाज करने में उसका लडक़ा राजाभाई एमबीबीएस डाक्टर पूरी तरह से नाकाम साबित रहा। जिसके नतीजन हल्वाई पिता को अपना इलाज बाहरी अस्पताल से करवाना पड़ा। प्रश्न यह है कि यदि यह डाक्टर इतना ही काबिल था तो उसने खुद का इलाज किसी बाहरी डाक्टर से क्यूं करवाया। समाजसेवी संगठनों ने राज्य के मुख्यमंत्री, सेहत मंत्री से गुहार लगाई है कि ऐसे डाक्टरों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्यवायी की जाए, जिससे आवाम् की
जिन्दगी खतरे में ना पड़े।